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तुलसी परिचय एवं प्रयोग

तुलसी 

तुलसी (बन तुलसी) विभिन्न नाम:- प्रसिद्ध नाम.बन तुलसी, रंगोली तुलसी, हिन्दी मरहटी-राम तुलसी, तुलसी, संस्कृत-अजवाला, अर्जिक छिद्र तुलसी, बंगले तुलसी राम तुलसी, पंजाबी-बबोई तुलसी, तामिल तलोगैचिम तलाशी, तेलगू-र। तलाशी, मलियालम-कछुआ, लातीनी-ओसिमम बेसिलिकम (ocimum bacdion अंग्रेजी-वाइल्ल तुलसी (wid Tulsilo)। पहचान:-बन तुलसी के पत्ते रीहान के पत्तों की भांति परन्तु इनमे है। इसमें अलग-अलग टहनियां निकलती है। इसका पौधा साधारण तल छोटा होता है। पत्तों का स्वाद लोग जैसा होता है। इसके बीज काले होते हैं। कद में छोटे पानी में भिगोने से इन पर लुआब की तह जम जाती हिन्दु लोग पुरातन समय से इस की पूजा करते आये हैं क्योंकि दे इसके सेवन से परिचित थे। अत: प्रसिद्ध वैद्य सुश्रुत ने अपनी पुस्तक शुश्रुत सहित में औषधि के रूप में इस औषधि का वर्णन किया है। भारत तथा पाकिस्तान प्रत्येक क्षेत्र के अतिरिक्त ईरान आदि देशों में साधारणतया पाई जाती है। म में गर्म तथा द्वितीय श्रेणी में शुष्क, बीज गर्मी तथा खुशकी में दरम्याना अनशा तथा मस्तिष्क के लिए नुकसान देते हैं इसका बदल एक प्रकार की तुलसी दूसरी प्रकार की तुलसी का बदल है।


लाभ- विशेषता बाहरी रुप में हरी तुलसी के पत्तों को कूट कर अर्क नीबू के साथ मिलाकर दाद, खुजली तथा अन्य त्वचा रोगों में लेप करना लाभदायक है। यह चेहरे के काले दागों तथा छाईयों को दूर करके रंग को भी निखारी है। फुलबहरी के लिए भी अधिक बढ़िया औषधि है इसके हरे पत्तों का स कान में टपकाना कान पीड़ा को दूर करने के लिए उत्तम श्रेणी की औषधि है।

सांप तथा बिच्छू काटे में भी अधिक लाभदायक है। इसके हरे पत्तों को कूट काटी हुई जगह पर लेप लगा दें। जब इसका रंग काला हो जाए उतार इसी प्रकार दूसरी बार लेप करें। यहां तक कि इस का लेप काला । हो जाए। इस प्रकार सब विष लेप में मिल कर शरीर से निकल जाता है। खाने के रुप में हरे पत्तों को काली मिर्च के 6 दाने के साथ आधा । में घोटकर देने से नजला, ज्वर तथा कम्पन ज्वर दूर हो जाता है। साथ आधी छटाक पान कर खाने से भूख खूब लगती है। और बदहजमी दूर हो जाती है। । का जोशांदा तैयार करके थोड़ा दूध तथा शक्कर मिला कर चाय के रूप में सेव कराना थकान, नजला, जुकाम तथा खांसी को दूर कर देता है। इसके पत्तों का रस 
अर्क निकाल कर मात्र 10 ग्राम, एक ग्राम काली मिर्च के सफफ के साथ प्रतिदिन प्रातः को पीना ज्वर, प्रवाहिका, अजीर्ण, खांसी इत्यादि के लिए लाभदायक है। यदि इसके रस के साथ शहद, अदरक तथा प्याज़ का रस भी मिला दिया जाये तो खांसी श्वास आने के लिए अलौकिक औषधि है। इसके बालों को बारीक पीसकर गाय के दूध के साथ देना वमन तथा अतिसार के लिए लाभदायक है। विशेषता शिशुओं में इसकी जड़ का जोशांदा ?

ऋतु ज्वरों के लिए अधिक लाभदायक है। इसके बीज वीर्य गाढ़ा करने वाले हैं। दिनों को के लिए तुलसी का सेवन करना लाभदायक है। निम्नलिखित तुलसी के नस्खे अधिक सुगम तथा जांचे हुए है।

काली खांसी- तुलसी बीज, बच, पीपल, असल अलसोस प्रत्येक 5 ग्राम, बारीक पीसकर गाय के दूध के साथ देना वमन तथा अतिसार के

कर सफेद 25 ग्राम आधा किलो पानी में जोश दे। जब तिहाई रह जाए उतार कर रख लें। इसमें से एक चमचा चाय भर दिन में छः बार पुच्चे को सेवन कराएं। बालों की काली खांसी में अधिक लाभदायक तथा उपयोगी है। तुलसी पिलज:- तुलसी के बीज, काली मिर्च, तबाशीर, सत गिलो, सफेद जीरा, समान वजन लेकर बारीक पीस कर मूंग के दाना के बराबर गोलियां बनाएं। एक-एक गोली दूध में मिला करके बच्चे को पिलाएं। बच्चों के ज्वर के लिए बहुत लाभदायक है। फूल माला- तुलसी के पत्ते 25 नग, 5 नग शुद्ध मोतियों के साथ 24 गोलियां बना कर तथा एक-एक गोली प्रातः तथा सांय अर्क गाओजबान के साथ देना फूल माता, आंत्रिक ज्वर और छोटी माता के लिए लाभदायक है। शिशुओं के अतिसार:- इसके बीज 1 रत्ती शर्बत अनार, 6 ग्राम में सेवन करें


नमक तुलसी:- तुलसी के सब पौधे को शुष्क करके जला लें और राल को पानी में तर करके इस का निथार निकालें। इस निथार को साफ कड़ाही में पका। नमक रह जाएगा यह नमक आमाशय को शक्ति देता तथा पाचन ठीक करता है। कफ सुगमता से निकालता है मात्रा 1 रत्ती से 2 रत्ती तक। पडो की शक्ति का तेल- तुलसी के पत्तों का पानी चौथाई किलो. तिलों का तेल चौथाई किलो, दोनों को मिलाकर नर्म आग पर पकाएं। जब पानी शुष्क हो जाए तो तेल को साफ कर लें। यह तेल अर्ध गर्म की मालिश पट्ठों को शक्ति देता है। मलेरिया वट्टी:- तुलसी के पत्ते, कीकर के पत्ते, काली मिर्च, पिपली, करन्जुआ की गिरी, भस्म हड़ताल गोदन्ती, समान वजन कूट छान कर पानी के साथ चने के बराबर गोलियां बनाएं। हर प्रकार के मौसमी ज्वर (मलेरिया) के लिए 1.गोली अर्क सौंफ का अर्क गाओजबान या अर्ध गर्म पानी के साथ दिन में दो बार दें।

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